A Saddest truth on Sikh genocide in India 1984

१ नवंबर १९८४ से आज १ नवंबर २०११ तक की दर्द भरी दास्तान…….कातिल भी यही, पुलिस भी इनकी, सरकार भी इनकी, अदालतें भी इनकी और गुंडे भी इनके–न्याय मिले तो कैसे?

अफ़सोस तो इस बात का है कि इंदिरा के मरने पर धर्म के नाम पर कत्ले आम किया गया यह कह कर कि हिन्दुओं की माँ सिखों ने मार दी है और हिन्दू भडक गए? क्या हिन्दू कान के इतने कच्चे हैं या स्वार्थ में अंधे जिन्हें यह भी नहीं दिखाई दिया कि उनकी माँ मुस्लिम है या हिन्दू? क्या हिन्दुओं की माता इंदिरा विधर्मी नहीं थी? क्या उसने मुस्लिम धर्म ग्रहण नहीं किया था? क्या उसका नाम मैमूना बेगम नहीं था और क्या उसका एक पारसी मुस्लिम फ़िरोज़ के साथ निकाह नहीं हुआ था? गाँधी नाम तो उसके पति को महात्मा गाँधी ने अपना दत्तक पुत्र बना कर दिया था तो क्या इसका यह अर्थ नहीं कि एक हिन्दू लडकी को महात्मा गाँधी द्वारा एक मुस्लिम से शादी करने के लिए उकसाया गया और फिर भी हिन्दू उसे महात्मा कहते हैं? जब इंदिरा का पिता नेहरु नहीं माना तो गाँधी ने फ़िरोज़ को अपना दत्तक पुत्र बना लिया लेकिन यदि आज कोई भद्र हिन्दू यही कृत्य करे तो क्या हिन्दू उसकी जान के पीछे नहीं पड़ जायेंगे? इसी मोहन दास गाँधी का बेटा हरि बाबू भी मुस्लिम बन गया था जिस से गाँधी ने अपने संबंध खत्म कर दिए थे ! क्यों? जब अपने परिवार का सदस्य विधर्मी हुआ तो बर्दाश्त न हुआ परन्तु दूसरे का घर बर्बाद कर के भी महात्मा? वाह रे हिन्दू समाज?

इसी इंदिरा को जगन्नाथ मंदिर में घुसने नहीं दिया गया था–कारण भी स्पष्ट था–विधर्मी ! सारे देश में जगन्नाथ मंदिर कमेटी कि भर्त्सना हुई थी पर वे अडिग रहे थे जो यह स्पष्ट घोषणा थी कि इंदिरा परिवार एक मुस्लिम परिवार है तो फिर १९८४ में कांग्रेस के बहकावे में सहिष्णु हिन्दू कैसे आ गए और अपना विवेक खो बैठे? और सदियों से बने विश्वास को चकनाचूर कर दिया, विश्वासघात किया सिख समाज के साथ क्योंकि सदियों से मुसलमान हमारे शत्रु थे पर हिन्दुओं के साथ तो रोटी-बेटी की सांझ थी? इस सांझ को तोडा भी तो एक मुस्लिम राजीव गाँधी  ने जो छलावा देता है हिन्दू होने का —- पर क्या हकीक़त में वह हिन्दू था? मेरी जानकारी में तो वह इस्लाम भी छोड़ चूका था और ईसाई बन गया था और उसके बच्चे भी ईसाई हैं—शायद अब भारतीय कांग्रेस एक ईसाई को भविष्य में प्रधान मंत्री बनाने जा रही है? भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं भूत पूर्व प्रधान मंत्री वाजपेयी ने भी इंदिरा को दुर्गा कहा था! क्या अब हिन्दू अपनी देवियों की तुलना मुस्लिम स्त्रियों से करने लगे हैं?

भारतवर्ष का दुर्भाग्य—इसे बर्बाद करने में इसके अपने बाशिंदों का हाथ भी रहा है ! अब देखी, राजीव गाँधी इस देश का प्रधान मंत्री बनाया गया, संवेदना के रूप में अपनी माता की मृत्यु को वोटों द्वारा भुगतान किया गया और बड़ी भरी सफलता से उसने देश में नई सरकार का गठन किया, इस देश का प्रधान मंत्री भी मुस्लिम और पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का राष्ट्रपति भी मुस्लिम—दोनों ही सिखों के दुश्मन? फिर भी एक नकली मुसलमान था तो दूसरा एक सच्चा मुसलमान था जिस का नाम था ‘जिया उल हक’  ! वह अधिक सूझ बूझ वाला इंसान था, उसने कई सदियों से चली आ रही सिखों और मुसलमानों की दुश्मनी को दोस्ती में बदलने के प्रयत्न आरंभ किये—उसे भी सफलता मिली चाहे निम्न स्तर पर ही, पर अपने प्रयत्नों के लिए उसने ख्याति अर्जित की और सिख समाज मुस्लिम समाज के नजदीक आया–दोनों में विश्वास बढ़ा परन्तु नकली मुसलमान ने सदियों से चले आ रहे हिन्दू सिखों के विश्वास को चकना चूर करने में कोई विलंब न किया, उसने जो विद्वेष और घ्रणा के बीज बोए वे अब वृक्ष का रूप ले चुके हैं, उसके भावी वंशजों ने और आने वाली कांग्रेस सरकारों ने १९८४ के कातिलों को पनाह दी (क्योंकि इस कत्लेंआम के सूत्रधार भी जो वही थे) यदि पनाह न देते तो उनका स्वयं का सत्य उजागर हो जाता, सारे संसार के सामने यह परिवार नंगा हो जाता इसलिए अपने दुष कृत्य को छुपाने के लिए प्रपंच का सहारा लिया गाँधी परिवार ने !

अब प्रकृति का न्याय भी देखी— राजीव गाँधी ने सिखों को जीते जागते ही जलवा दिया, उनके बच्चे अपने पिता की मृत देह भी न देख सके उनके हाथ लगी तो कुछ हड्डियाँ या राख, भगवान ने इस परिवार को वो सजा दी जिस की इस परिवार ने कल्पना भी न की होगी ! इसी हत्यारे राजीव गाँधी को भगवान ने –“जैसी करनी वैसी भरनी” के अनुसार सजा दी! इस की मृत्य एक बंब विस्फोट में हुई लेकिन इसके बच्चे भी इसकी मृत देह को न देख सके—उनके हाथ भी लगी तो केवल एक टांग जो उसके रीबोक जूते से अपनी पहचान की घोषणा कर रही थी ! बाकी शारीर का कोई अंग नहीं मिला फिर भी उसकी पत्नी सोनिया ने या अन्य पारिवारिक सदस्यों ने कोई सबक नहीं सीखा, उन्हें अभी भी भगवान का न्याय दिखाई नहीं दिया ! इसी कारण जुल्मों का दस्तूर बतौर जारी है, कातिलों को सत्ता के नशे में पनाह दी जा रही है, कानूनी प्रक्रिया को लंबा खींचा जा रहा है जिससे उनके चहेतों को फायदा मिले और संसार में संदेश जाए कि भारत सरकार न्यायिक व्यवस्था में यकीन रखती है परन्तु अब यह सत्य स्वयं ही प्रकट हो चुका है, अब तथ्यों को छुपाने से कुछ हासिल नहीं होगा क्योंकि प्रमाण अब स्वत: ही बोलने लगे हैं, पाप का घडा भर चुका है परन्तु स्वार्थ में अंधे और चाटुकारों से घिरी सोनिया और उसके सरकार के मंत्रियों को यह सत्य अभी भी दिखाई नहीं दे रहा—शायद नियति में और भी कुछ लिखा है?

निर्दोष सिखों का बड़ी बेरहमी से कत्ल किया गया ! अमिताभ बच्चन ने इस आग को और हवा दी, उस ने टी वी पर आ कर हिन्दुओं से सिखों का खून मांगा और कत्लेआम के लिए उकसाया ! सज्जन कुमार, जगदीश टाईटलर, हरी कृष्ण लाल भगत, कमल नाथ, ललित माकन जैसे तो कुत्ते थे जिन्हों ने सिर्फ अपने चुनाव क्षेत्र में निर्दोष सिखों की हत्याएं कीं परन्तु अमिताभ बच्चन फ़िल्मी जगत की जानी मानी हस्ती था, इसने टी वी पर आकर सारे भारतवर्ष में हिंसा फैलाई और इसके उकसाने के कारण ही बोकारो, कानपूर, जबलपुर तथा अन्य शहरों में भी सिखों पर कातिलाना हमले हुए—फिर भी हिन्दू समाज का यह एक चहेता अभिनेता है? जिन सिखों ने सदा ही हिन्दू स्त्रियों की रक्षा की–इस हिन्दू समाज के गुंडों ने उन्हीं की स्त्रियों को उनके पुत्रों के सामने ही या उनके पतियों की मृत देह के समक्ष ही अपनी घ्रणित वासना का शिकार बनाया—यह हिन्दू समाज और इस देश के चारित्रिक पतन का एक उदाहरण है, हिन्दू स्वयं में झाँक कर देखें की उनका चारित्रिक पतन किनके हाथों हुआ—उनके अपने नेताओं के कारण और जब समाज का चारित्रिक पतन हो जाए तो देश का पतन दूर नहीं ?

इस देश की बागडोर एक विदेशी महिला के हाथों में है जो मुस्लिम की पत्नी थी परन्तु एक ईसाई है ! एक स्त्री होकर भी वह इस देश की स्त्रियों   से न्याय नहीं कर रही? वह पनाह दे रही है बलात्कारियों को, वह पनाह दे रही है – उनके पतियों के कातिलों को, वह पनाह दे रही है – उनके बच्चों को अनाथ बनाने वालों को क्योंकि उसे शायद बलात्कार का दर्द नहीं पता? उसे अहसास ही नहीं कि बलात्कारी स्त्री की मनोदशा का, उसकी मानसिक पीड़ा का ? या तो वह इस मानसिक कष्ट को एक विदेशी होने के नाते महसूस नहीं कर पाती या स्त्रियों से बलात्कार उस के देश की सभ्यता में शामिल होगा अन्यथा वह अवश्य ही इन्हें पनाह देने की बजाए इनको सजा दिलवाती परन्तु वह तो स्त्री होकर भी स्त्री नहीं, उसमें स्त्रियों के स्वाभाविक गुण ही नहीं हैं ! यही तो अंतर है एक विदेशी सभ्यता में पली स्त्री और भारतीय परिवेश में पली स्त्री के चरित्र में? शायद यदि उसे कोई यह सत्य बता दे और भगवान उसे सद-बुद्धि दें तो वह इन कातिलों को पनाह देने की बजाए अपने प्रभाव से इन्हें जेल के सींखचों के पीछे भेजे—इसी में देश की भलाई निश्चित है नहीं तो अलग देश की भावना जो हमारे दिल में समा चुकी है – इस कांग्रेस शासन और इसकी सिखों के प्रति दुश्मनी से–वह आज या कल अपना रंग अवश्य दिखाएगी–आज यह अपने वास्तविक स्वरूप न दिखा पाए लेकिन एक दिन सिख अपना देश अवश्य बना लेंगे–ऐसा मेरा विश्वास है !

लेखक : अजमेर सिंह रंधावा (Ajmer Singh Randhawa)

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s


%d bloggers like this: