सिख युवकों का अनुपम शौर्य और परास्त भारतीय सेना

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सिख युवकों का अनुपम शौर्य और परास्त भारतीय सेना 

सिख युवकों के शौर्य के आगे भारतीय सेना की इन्फैंट्री डिविजन (पैदल सेना) ने हथियार डाल दिए थे! ७२ घंटे तक चली इस कार्रवाई में संसार की श्रेष्ठतम सेनाओं में से एक जिसने पाकिस्तान को इस से पहले तीन बार धूल चटाई थी — आज मुट्ठी भर सिख युवकों के शौर्य के आगे विवश थी!

 
दरबार साहिब स्थित घंटा घर से श्री अकाल तखत तक का फासला लगभग २०० मीटर है! भारतीय जनरलों को विश्वास था कि वे आधे घंटे में इस कार्रवाई को अंजाम दे देंगे परन्तु ७२ घंटे तक भी यह विशाल सेना २०० मीटर का फासला तय नही कर पाई थी! ऐसे प्रतिरोध का सामना करना पड़ा  था भारतीय सेना को! सपने में भी उसे यह उम्मीद न थी कि मुट्ठी भर सिख युवक, भारतीय सेना की बढत रोक देंगे परन्तु सिखों में शहीदी का चाव जन्म से ही होता है—-वे अपने गुरु के वचन का पालन करते हुए मैदाने जंग में शहीद होना और गुरु को अपना सिर भेंट करने में गौरव महसूस करते हैं! सिख लड़ रहे थे तो आततायियों की सेना से जिसने उनके पवित्रतम धार्मिक स्थान को नेस्तनाबूद करने की ठानी थी !अत: आतताइयों की इस फौज से लड़ कर शहीद होना, अपने धार्मिक स्थान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देना, अपने गुरु गोबिंद सिंह जी के प्रति अपनी वचन-बद्धता निभानी और अपने गुरु के महावाक्य — ‘सवा लाख से एक लड़ाऊँ !! तभै गोबिंद सिंह नाम कहाऊँ !!’ को चरितार्थ करते हुए शहीदी का जाम पीना गौरव समझते थे जबकि भारतीय सेना तो अपनी आका इंदिरा माता को खुश करने के लिए लड़ रहे थे !

 

दोनों की लड़ाई का उद्देश्य भी अलग था ! 

 

भारतीय सेना के जनरलों द्वारा आपरेशन ब्लू स्टार की रण – नीति  बनाते हुए सिखों के पांचवें गुरु अर्जुन देव जी के शहीदी पर्व को जान-बूझ कर चुना गया था क्योंकि उस दिन श्रद्धालु बहुत अधिक संख्या में गुरूद्वारे में एकत्रित होते हैंऔर इस दिन भारतीय सेना द्वारा गुरूद्वारे पर आक्रमण करने के उनको दो फायदे होने थे;

 

पहला –  अधिक श्रद्धालु एकत्रित होने से फौज को उनकी आड़ में दरबार साहिब की परिक्रमा से होते हुए श्री अकाल तखत साहिब जी तक पहुंचना आसान हो जाता, फौज गोली चलाती तो मरना तो सिखों ने ही था, चाहे वे संत जरनैल सिंह जी के साथी  धार्मिक प्रवर्ति वाले सिख हों या श्रद्धालु सिख ! इंदिरा का भी तो यही आदेश था कि सिखों को चाहे जितनी संख्या में मारना पड़े परन्तु वे अकाल तखत पर आक्रमण कर के संत जरनैल सिंह जी को मारना चाहती थी ! तो इस  तरह फौज इन श्रद्धालु सिखों की आड़ में अपने को बचाती हुई श्री अकाल तखत साहिब जी पर आक्रमण करना चाहती थी! फौज जंग के मैदान में भी भेड़-बकरी या अन्य पशुओं की आड़ में धावा बोलती है, जिससे इन्हें जानी नुकसान होने का अंदेशा कम होता है !

 

यहाँ भी भारतीय फौज के जनरलों ने यही सोचा था कि वे भी अपने सैनिकों को सिख संगतों (श्रद्धालुओं) की आड़ में से होते हुए आधे घंटे में ही श्री अकाल तखत साहिब जी को घेर लेंगे और सफलता हासिल कर लेंगे क्योंकि सिख योद्धे अपने ही भाइयों, बहनों या बच्चों की हत्याएं नहीं करेंगे! परन्तु भीतर भी सिख योद्धे गुरिल्ला लड़ाई में निपुण तथा हर कौशल में कुशल थे, उन्होंने भारतीय फौज के धावे को एक दम खत्म कर दिया, करीबन सारे ही फौजी जो भीतर घुसे थे, पार बुला दिए गये थे!

 

अकाल तखत साहिब जी पर कब्ज़ा करने की लड़ाई ७२ घंटे चली परन्तु भारतीय सेना की पैदल सेना जब फेल हो गई और एक कदम भी आगे नहीं बढ पाई तो उन्हें ले जाने के लिए APC व्हीकल (बख्तरबंद गाड़ी) मंगाई गई परन्तु सिख लड़ाकू योद्धाओं  ने इस बख्तर बंद गाड़ी को भी उड़ा दिया !

 

अब भारतीय फौज के जनरलों के पसीने छूट गये! जिस लड़ाई को अपने अहं में उन्होंने मात्र आधे घंटे की सोची थी, उस लड़ाई में उन्हें जो जानी नुकसान उठाना पड़ा और फजीहत अलग से, इंदिरा को विश्वास अलग से दिलाया था कि आधे घंटे में फौजी कार्रवाई पूरी हो जाएगी, उसका तो कहीं अंत ही नजर नहीं आ रहा था! अब पैदल सेना के बस की बात नहीं रह गई थी, अत: अब जनरलों ने इंदिरा से टैंक इस्तेमाल करने की इजाजत मांगी जबकि मार्क तुली (बी बी सी संवाददाता) के अनुसार श्री अकाल तखत में केवल आखिरी १४ सिख ही शेष बचे थे परन्तु भारतीय पैदल सेना (इन्फंट्री) इतनी हतोत्साहित थी कि उसमें अब इतना दम नहीं था कि इन सिख योद्धाओं से मुकाबला कर पाती अत: भारी तोपखाने के इस्तेमाल से श्री अकाल तख्ता साहिब की पवित्र और एतिहासिक इमारत को ही टैंकों के गोलों का निशाना बना दिया गया, इस इमारत को नेस्तनाबूद कर दिया गया!

 

सारा संसार स्तब्ध था परन्तु सिख जगत मजबूर था! उनकी ऑंखें तो रोती थीं परन्तु आंसू सूख गये थे! उन्हें काटो तो खून नहीं था! उनका बस चलता तो अलग सिख देश उसी दिन बन जता! नफरत की आंधी भी चली थी! आक्रोश था सिख जगत में इंदिरा और भारतीय सेना के खिलाफ, अत; सिख जगत ने कटु फैसला लिया!

 

दो सिख योद्धाओं (भाई हरजिंदर सिंह जिन्दा और भाई सुखदेव सिंह सुक्खा ने) ने भारतीय फौज के प्रधान सेनापति और इंदिरा के चाटुकार जनरल अरुण कुमार वैद्य को पूना में गोलियों से उड़ा दिया!

 

अब बारी थी इंदिरा की जिसका अंत भी सिख योद्धाओं के हाथों निश्चित था!

इस से पूर्व सिख भारतीय सेना का एक  अभिन्न अंग रहे हैं! पिछले दोनों विश्व युद्धों में उन्होंने फ़्रांस, इटली, मलयेशिया, अफ्रीका,बर्मा आदि (सभी यूरोपीय, देशों, मध्य पूर्व तथा दक्षिण पूर्व) देशों में अपनी शूरवीरता के परचम लहराए थे! आज भी उनकी बेमिसाल बहादुरी को चिरंजीवी बनाने के लिए लगभग सभी देशों में उनकी याद में स्मारक बनाये गये हैं! इन युद्धों में भी एक लाख से उपर सिख सैनिकों ने अपनी आहुतियाँ दी थीं!

 

आज़ाद हिंद फौज में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है! इस की कुल संख्या के लगभग ६०% सिख सैनिक ही थे!

 

भारतीय सेना का एक अभिन्न अंग होते हुए भी भारतीय सेना सिखों के शौर्य से अंजान ही रही क्योंकि…..’घर की मुर्गी दाल बराबर !’ भारतीय सेना को सिखों की वीरता से कभी सीधा वास्ता नही पड़ा था! दुश्मनों को पड़ा था और उन्होंने इनकी शौर्य गाथाएं भी लिखी!

 

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Ajmer Singh Randhawa

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